Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
ब्रह्माण्डानां तादृशानां दूरे दूरे पुनःपुनः ।
मिथोलक्षाणि लक्षाणि कचन्त्युपरमन्ति च ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
नक्षत्र मण्डल नीचे ओर ऊपर कहाँतक विस्तृत है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं ।
पाताल से लेकर द्युलोक तक वह नक्षत्र मण्डल आकाश में वधा हे । सबसे ऊँचे स्थित ध्रुव को
छोडकर ओर सारा नक्षत्रमण्डल चारों ओर भ्रमण करता हुआ दशो दिशाओं में संचार करता हे