Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
प्रकृतं श्रृणु हे राम तद्ब्रह्माण्डकवाटकम् ।
यत्प्रमाणं ततो वारि बाह्ये दशगुणं स्थितम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
नदी आदि का नीचे की ओर बहना आदि स्वभाव से विपरीत स्वभाव का भी यदि कहीं चित् द्वारा
अवभास होता तो उसके भी अस्तित्व की ही प्रतीति होती अस्व की प्रतीति नहीं होती जैसे कि स्वप्न
में जाग्रत से विपरीत स्वभाव की प्रतीति होती है, ऐसा कहते हैं।
यदि सृष्टि के आदि में चित् में ऊपर को प्रवाहित होनेवाली नदियों की तथा नीचे की ओर ज्वालावाले
अग्नि की प्रतीति होती, जैसे कि स्वप्न में प्रतीति होती है, तो वह विपरीत प्रतीति आज भी वैसे ही
स्थित रहती