Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 120
एक सौ अठारहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ उननीसवाँ सर्ग पथिक का अपनी प्रिया से भेंट होने व उसके आगे उसके वियोग से हुई अपनी मरणान्त दशा का वर्णन।
26 verse-groups
- Verse 1सहचरो ने कहा : राजन्, देखिये, मन्दर की झाड़ी में यह पथिक चिरकाल के पश्चात् प्राप्त हुई…
- Verse 2प्रिया के आगे उससे वर्णित विरह कथा का वर्णन करने के लिए भ्रूमिका बोधता ह / हे प्रिये, तुम…
- Verse 3इस महाप्रलयकाल के तुल्य वियोग में (विरहरूप महती आपत्ति में) यहाँपर स्थित मुझे समाचार पहुँ…
- Verse 4हाँ याद आई, सामने पर्वत शिखर पर यह दिखाई दे रहा मेघ प्रेम से सदा परदुःख को निवृत्त करना आ…
- Verse 5अरे भाई मेघ, तुम्हारे गले मेँ गुण है यानी तुम गुणवान् हो । गुणशाली अपने योग्य इन्द्रधनुष…
- Verse 6हे मेघ, उस प्रिया का चित्तरूपी तूलिका से हृदयरूपी आकाश पर चित्र लिखकर मैने आलिगन किया, अभ…
- Verse 7हे कृशांगि, इस तरह मेघ से कहकर तुम्हारी चिन्ता से पराधीन बुद्धिवाले मेरे मन का व्यापार भी…
- Verse 8तदनन्तर मेरी वैसी अवस्था देखकर एकत्र हुए जनसमूह मे महा हाहाकार मचा और देखने के लिये आ रही…
- Verse 9उसके पश्चात् पथिक लोगों ने यह मर गया है, ऐसा निश्चय कर आँखों में आँसू भर कर शवोचित पूजा…
- Verses 10–11हे कमलाक्षि, वहाँ पर अश्रुपूर्ण नेत्रराजिवाले कु पथिको ने मुझे चितारूपी शय्यापर रक्खा । व…
- Verse 12हे प्रिये, मँ तुम्हारे आकाररूप अमृत से कवचावृत था, अतएव कवचावृत मुझको उक्त धूम्रपंक्ति ने…
- Verse 13हे कृशांगि, मूर्च्छावस्था में इतने कालतक अपने हृदय में तुम्हारे साथ मैंने लीलामनोहर जिस स…
- Verse 14हे प्रिये, तुम्हारी वह केवल स्वानुभव से ज्ञेय निरतिशयानन्दरूप अनुपम लीला, वैसे ही भौंह मट…
- Verse 15हे मुग्धे, उसके पश्चात् मैं तुम्हारे संगम से अतितृप्त होने के कारण थकने से शिथिल होकर वह…
- Verse 16इस बीच में एकाएक मैंने जैसे चन्दनपंक के सदुश शीतल विशाल चन्द्रबिम्ब से मेघनिघोषि के साथ व…
- Verse 17सहचरो ने कहा : राजन्, उक्त प्रिय के ऐसा कहने पर कहा “भे मरी" कहती हुई वह मुग्धा नायिका म…
- Verse 18मूर्छित अपनी प्रिया को यह बेचारा पति नलिनी के पत्तों के पंखे से तथा जल से कैसे प्रकृतिस्थ…
- Verse 19फिर प्रिया के पूछने पर देखो यह उसी कथा को पास मेँ बैठी हुई अपनी प्रिया से उसकी दुड़ी पकड़…
- Verse 20हे प्रिये, मुञ्चे जब आग की लपटों से कुछ पीड़ा हुई तो ज्योंही मैंने घबराहट के साथ “अरे अरे…
- Verse 21तदुपरान्त मरे हुए के पुनः जी जाने से उत्पन्न हुए हर्षवश पथिक लोग चंचल तालियां के विलासरूप…
- Verse 22इसके पश्चात् मैंने संहारकारी रुद्र के शरीर के समान भीषण श्मशान देखा, वह अति विकट नायकहीन…
- Verse 23भगवान शंकर के आभूषण योग्य हड्डियों के टकार से कठोर शब्द करनेवाले वायु वहाँ पर बहते थे, वे…
- Verse 24वह श्मशान भूमि, जिसके वृक्षों के पत्ते धधकती हुई अग्निवाली चिताओं के प्रवाहरूप से निकल रह…
- Verse 25मैने वैसा श्मशान देखा, जो असंख्य भीषण आधे जले नरककंकालों से अत्यन्त दुर्गन्धिपूर्णं था ओर…
- Verse 26वहाँ पर जलाने के लिये लाये गये नाना मुर्दों के बन्धु- बान्धवं के रोने-धोने से उसके दिगन्त…
- Verses 27–35कहीं पर चिताओं के संचालन से महान् प्रकाश हो जाता था, कहीं पर बहुत बड़ी केशराशि द्वारा वह…