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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

पत्राला घनसंघाताः सच्छायावृतभूभृतः । गुणानां महतां योग्या वंशा वंशा इवोन्नताः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

हे कृशांगि, मूर्च्छावस्था में इतने कालतक अपने हृदय में तुम्हारे साथ मैंने लीलामनोहर जिस सुख का अनुभव किया, वह अभूतपूर्व था | अमृत के कुण्ड में गोते लगाने से जैसा सुख होता है वैसा ही वह सुख था । उस सुख का अनुभव होने पर यह प्रसिद्ध त्रैलोक्यराज्य के आधिपत्य से होनेवाला सुख भी पूर्ववर्णित मर्मच्छेदन दुःख के समान तुच्छ ही है, ऐसी मेरी राय है