Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
सहचरा ऊचुः ।
एवंप्रायाः कथाः कुर्वत्पश्यैनन्मिथुनं महत् ।
पानं प्रवृत्तवत्सारं पातुं पद्मनिभेक्षण ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
सहचरो ने कहा : राजन्, देखिये, मन्दर की झाड़ी में यह पथिक चिरकाल के पश्चात् प्राप्त हुई
अपनी प्रिया के आगे भूतपूर्वं अपनी विरह-कथा कहता है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ अठारहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ उननीसवाँ सर्ग पथिक का अपनी प्रिया से भेंट होने व उसके आगे उसके वियोग से हुई अपनी मरणान्त दशा का वर्णन।