Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
नागलोकेन्द्रलोकस्त्रीगमनागमनोद्भवः ।
दिव्यो भूषणझांकारः श्रूयते नभसः श्रृणु ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
भगवान शंकर के आभूषण योग्य हड्डियों के टकार से कठोर शब्द करनेवाले वायु वहाँ पर
बहते थे, वे समीपवर्ती वन की हरियाली को राख उड़ाकर हर रहे थे, गल रहे सड़े-पड़े नर कंकालों
की दुर्गन्ध को फैला रहे थे, प्रचुर भर्मराशि से गाढ़ तरकस में चन्द्रमा से गिरे हुए बाणो का-सा उनका
आकार था