Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 120, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
वीचयो रत्नमाणिक्यपदेष्वावर्तवृत्तिभिः ।
विलसन्ति विलासिन्यो वक्षःस्विव विलासिनाम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके पश्चात् मैंने संहारकारी रुद्र के
शरीर के समान भीषण श्मशान देखा, वह अति विकट नायकहीन पिशाच आदि के लिये सुखकारी
था, राख, माँस और मुर्दो की खोपड़ियों के ढेरों से व्याप्त था तथा चन्द्रमा के सदुश सफेद हड्डियाँ
और कपाल उसमें बिखरे थे । संहाररुद्र का शरीर भी विकट विनायक आदि गणो को सुखदायक
है, विभूति, सर्पहार ओर शवकपालों से व्याप्त है और चन्द्रकिरणों से शुभ्र मुण्डमालाएँ भी उसमें
हैं