Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 108
एक सौ छठवाँ सर्ग समाप्त एक सो सातवाँ खर्म अचेत्य पृथिवी आदि की अवस्तुता तथा स्वप्न की भाँति जगत् चित् का स्फुरण है, यह उपपादन।
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- Verse 1विश्व के वेत्यभाव का निराकरण कर उसे चिन्मात्र सिद्ध करने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं / अचेत…
- Verse 2प्रतिज्ञा त्रिद्धि के दो फल हैं । स्थित जयत् के जयद्भाव की निवृत्ति और जी रहे हम लोगों क…
- Verse 3अथवा उक्त प्रतिज्ञाम्रिद्धि का फल सव पदार्थों की कुटस्थता और अमूर्तता है, ऐसा कहते हैं /…
- Verses 4–5अथवा आकाश की नीलता के सदश भासित हो रहे विश्व की असत्यता को उक्त ग्रतिज्ञाश्निद्धि का फल ज…
- Verse 6ठीक नहीं है, ऐसा फलित कहते हैं / वैसे ही इस जगत्-नामवाले चित् के स्फुरणरूप अनुभूत होने…
- Verse 7पृथिवी आदि प्रपंच चिद्रूपी बालक की कल्पनाओं का राशिरूप है, शून्यरूप है, व्यर्थ है, अवस्तु…
- Verse 8हे मूढ़ लोगों, कहो तो "यह मेरा है यह मैं हूँ इस प्रकार की आस्था क्या ठीक है ? अर्थात् अन…
- Verse 9अतएव जिन्हे तनिक भी विवेक झलक प्राप्त हो गरु उन्हे अत् पथिकी आदि का लाभ करानेवाला विचार,…
- Verse 10प्रथिवी आदि की सत्ता का, क कारण न होने से अनुत्पत्ति द्वार, पहले उपपादन कर बुके हैं; ऐसा…
- Verse 11इस व्यवहार में तल्लीनता विद्वानों के लिए हास्यास्पद ही है, ऐसा कहते हैं / जो लोग कभी उत्…
- Verse 12तात्विक दृष्टि में प्रथिवी आदि की अत्यन्त असंभावना अपने अनुधव-बल से कहते हैं। ये पृथिवी आ…
- Verse 13मूढद्वाष्टि को तो हम प्रमाण नहीं मान सकते, ऐसा कहते हैं / कार्य, कारण, काल आदि की कल्पनाव…
- Verse 14तत्त्वज्ञो की दृष्टि में पृथिवी आदि से रहित और मूढो की दृष्टि मे पृथिवी आदि से युक्त जगत्…
- Verses 15–48स्वानुभवैक वेद्य जो इस चिदाकाश का निराकार स्वरूप है, वही यह महीतल आदि रूप से वेद्य, दृश्य…