Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 108, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 108, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 108 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अविद्या विद्यते येषामज्ञानां भूतलादिका ।
तेषामस्यां ब्रह्मणीव नास्त्यन्तोऽत्र कथां श्रृणु ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा उक्त प्रतिज्ञाम्रिद्धि का फल सव पदार्थों की कुटस्थता और अमूर्तता है, ऐसा कहते हैं /
व्यवहार में प्रतिष्ठित भी सब प्राणी काठ के समान मौन को अर्थात् अत्यन्त निष्क्रियता
(निश्चेष्टता) रूप कूटस्थता को ही प्राप्त हैं अथवा सभी स्थावर-जंगम (चर-अचर) पदार्थ
आत्यन्तिक अमूर्तता को प्राप्त हैं