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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 108, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 108, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 108 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

स ब्रह्मण्यमतिर्मानी वह्निमेवाधिदैवतम् । अपूजयत्समं भक्त्या देव वेत्ति स्म नेतरम् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

प्रथिवी आदि की सत्ता का, क कारण न होने से अनुत्पत्ति द्वार, पहले उपपादन कर बुके हैं; ऐसा कहते हैं / सहकारी आदि कारणों के अभाव से जो सृष्टि के प्रारम्भ में ही उत्पन्न नहीं हुआ भला बतलाइये तो वह आज कहाँ से उत्पन्न होगा ?