Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 108, Verses 4–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 108, verses 4–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 108 · श्लोक 4,5
संस्कृत श्लोक
सदृशं जगतोऽस्यास्ति क्वचिदम्बरकोणके ।
कस्मिंश्चिद्त्रिजगत्किंचिदनयैव व्यवस्थया ॥ ४ ॥
अस्ति कश्चिद्भुवो भागो भूषणं तत्र भूस्थितेः ।
पुरी ततमितिर्नाम्ना सुव्यक्तकलनाऽवनौ ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा आकाश की नीलता के सदश भासित हो रहे विश्व की असत्यता को उक्त ग्रतिज्ञाश्निद्धि
का फल जानिये, ऐसा कहते हैं /
आकाश में काँच और केशों की नीलता के समान जो कुछ यह व्याप्त है, उसे आप शून्य ही
(कुछ भी नहीं) जानिये कारण कि चिदाकाश से क्या कहाँ से होगा ? आकाश में केशसमूह के
समान नीलता, नदी, रथ, धूम्रपंक्ति और मोतियों के सदुश जो आकाश का स्फुरण होता है, उसके
अनुभूत (अनुभव में आरूढ) होने पर भी उसमें वस्तुता नहीं है