Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 108, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 108, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 108 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
तस्याज्ञस्य कियत्कालं किंरूपा स्यात्किमात्मिका ।
कियती सा च वेत्येवं मुने मे कथ्यतां पुनः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रतिज्ञा त्रिद्धि के दो फल हैं । स्थित जयत् के जयद्भाव की निवृत्ति और जी रहे हम लोगों के
जीवभाव की निवरतः एसा कहते हैं /
इसलिए जीता हुआ भी यह सारा प्रपंच मरा सरीखा है । यह, मैं और तुम भी सब जीते हुए भी
मरे-से हैं