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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 1

26 verse-groups

  1. Verses 1–12यह सम्पूर्ण दुःखों को छुड़ानेवाला विचारनामक चिन्तामणि हृदय में स्थित रहते हुए भी सब मनुष्…
  2. Verse 13दृश्य-दर्शन से निर्मुक्त जो आत्मतत्त्व है वही मुख्य असंकल्प है । हे श्रीरामजी, आप तन्मय ह…
  3. Verse 14हे श्रीरामजी, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि संकल्प की चेष्टा छोड़कर एकमात्र चुपचाप स्थि…
  4. Verse 15प्राक्तन छकल्यग्रयुक्त कियाओं के वेग से ही वेगक्षययर्यन्त जो व्यवहार की चिद्धि होती हैं,…
  5. Verse 16(अवेदनमसकल्पस्तन्मयेनैव श्रयताम्‌“ यह जो ऊपर कहा ग्या हैं उसका व्यवहारकाले भी उपयान करते…
  6. Verse 17जैसे स्वतः संकल्प से निर्मुक्त एक छोटा-सा तृण वायु आदि के प्रवाह में पड़कर दूसरे तृण आदि…
  7. Verse 18दूसरों के कौतुक के लिए नृत्य आदि कर रही-सी स्थित कठपुतली को जैसे नट के समान श्रृंगार आदि…
  8. Verse 19समस्त इन्द्रियं के द्वारा विषयों के अनुभव आपको ऐसे नीरस मालूम पड़े, जैसे कि हेमन्त ऋतु मे…
  9. Verse 20बोधरूपी सूर्य जिसके रसका (भावना का) पान कर गया है, ऐसी पंचकोश संवलित चिदाभास, मनसहित प्रा…
  10. Verse 21भला नीरत कडव्ग का जीवन कैसे रह सकता हैं, इस आशंका पर कहते हैं / आवरणशून्य भूमानन्दस्वरूप…
  11. Verse 22इन्द्रियवृत्तियों को विषयों की ओर जाने से न रोकने में तथा उन्हें सरस बनाये रखने में क्या…
  12. Verse 23संकल्पशून्य होकर यदि आप वायु, अग्निज्वाला, यन्त्र ओर जल के समान स्पन्द करते रहेंगे, तब तो…
  13. Verse 24जन्मरूपी ज्वर के निवारण के लिए यही सबसे बढ़कर उत्तम उपाय है कि अपने कर्मो में जो कर्तृत्व…
  14. Verse 25वासनाओं ओर संकलपों से शून्य होकर प्रारब्ध-प्राप्त कार्यों के अनुसार बर्ताव कर रहे आप चाक…
  15. Verse 26कर्मफल में आपकी आसक्त बुद्धि न हो और कर्मों के त्याग में भी आपकी आसक्ति (कर्मत्याग के फल…
  16. Verse 27हे श्रीरामजी, अब इस विषय में और अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है । संक्षेप में यही कह देता ह…
  17. Verse 28यहाँ पर न कहीं कोई कार्य है और न कहीं कोई अकार्य (त्याज्य) है, किन्तु सब अज, शान्त, अनन्त…
  18. Verse 29सांसारिक सब कार्य निष्क्रिय ब्रह्मरूप हैं और निष्क्रिय ब्रह्मभाव में स्थिति अवश्य करना चा…
  19. Verse 30हे श्रीरामजी, विषयों के विस्मरण को ही चित्त का क्षय तथा जीवब्रह्मैक्यरूप योग कहते हैं, इस…
  20. Verse 31स्यन्दशन्य होकर चुपचाप बेंठे रहना तो एकमात्र दुःखदायक ही होगा, जैसे कि आम-वात से जड़ बना…
  21. Verse 32संकल्प का उदय न हो तथा पत्थर के उदर में लता की नाई आप में इच्छा भी उदित न हो
  22. Verse 33संकल्पशून्य शान्त पुरुष को जीवित रहते या न रहते इस संसार मेँ किये या न किये गये लौकिक या…
  23. Verse 34क्यों नहीं होता, इच शंका पर कहते हैं / हे श्रीरामजी, चूँकि आप कर्म और अकर्म इन दोनों के ब…
  24. Verse 35यही कारण है कि देहादि में -अह मम“ इस तरह का ज्ञान रखनेवाले को ही विधि और निषेध शास्त्रों…
  25. Verse 36हे श्रीरामजी, "अहं", “मम” यह सर्वथा नहीं है । जो है सो केवल परम शिव ही है। भूमानन्द शिव स…
  26. Verse 37इसीको स्पष्टरूप से कहते हैं / हे रामभद्र, जो कुछ यह जगत्‌ दिखाई दे रहा है, वह सुवर्ण की क…