Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
रसभावनमन्तस्ते मालं भवतु कर्मसु ।
दारुयन्त्रमयस्येव परार्थमिव कुर्वतः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
दूसरों के कौतुक के लिए नृत्य आदि कर रही-सी स्थित
कठपुतली को जैसे नट के समान श्रृंगार आदि रस की भावना नहीं होती, वैसे ही प्रारब्धप्राप्त
कर्म कर रहे आपको भी हृदय के भीतर कार्यों में, विषयसुख में मूर्ख की नाई, रस की भावना
(कौतुक बुद्धि) बिलकुल न हो