Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
यद्दृश्यते जगदिदं खलु किंचिदेतद्हेम्नोऽङ्गदत्वमिव भाति न विद्यमानम् ।
अस्य क्षयं विदुरवेदनमेव पश्चात्सत्यं तदेव परमार्थमथावशिष्टम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीको स्पष्टरूप से कहते हैं /
हे रामभद्र, जो कुछ यह जगत् दिखाई दे रहा है, वह सुवर्ण की कटक अंगद आदि रूपता के
सदृश केवल प्रतीतिमात्र है, उसकी पृथक् सत्ता नहीं है। आत्मा से भिन्न इसका अनुभव न करना
ही इसका नाश है। आत्मा के अज्ञान का नाश होने के अनन्तर अवशिष्ट दृश्य-बाध का अधिष्ठान
तो ज्ञान का अविषय ही है । इसी को अनुभवी लोग सत्य, एक और परम पुरुषार्थ कहते हैं