Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
समे शान्ते शिवे सूक्ष्मे द्वैतैक्यपरिवर्जिते ।
ततेऽनन्ते परे शुद्धे किं केन किल खिद्यते ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
स्यन्दशन्य होकर चुपचाप बेंठे रहना तो एकमात्र दुःखदायक ही होगा, जैसे कि आम-वात से
जड़ बना दिया गया शरीर दुःखदायी होता हैं, इस शका का कारण करते हैं /
सम, शान्त, शिव, सूक्ष्म, द्वैत एवं ऐक्य से वर्जित, व्यापक, अनन्त और शुद्ध परब्रह्म की
प्राप्ति हो जाने पर कौन किसलिए खिन्न हो सकता है ?