Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 99
अद्वानबेवाँ सर्ग समाप्त निनानबेवाँ सर्ग स्थूणानिखनन न्याय से बोध को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रबुद्ध हुए भी राजा शिखिध्वज को कुम्भ द्वारा पुनः बोधित करना।
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- Verses 1–4इस तरह बोधित हुए राजा शिखिध्वज-उपदेशजन्य ज्ञान से सम्पूर्ण सन्देह आदि का बीज मेरा अज्ञान…
- Verses 5–10राजा शिखिध्वज द्वारा कही गई बातों का अनुमोदन कर रहे कुम्भ ऋषि कहते है। कुम्भ ने कहा : हे…
- Verse 11उसीको स्पष्टरूप से बतलाते हैं। "देह आदि मैं हूँ” इस तरह का संकल्प अत्यन्त विनाशी बन्धन के…
- Verses 12–13मोक्ष क्या है, यह कहते हैं। सदा क्रमशः हो रहे बन्ध-मोक्ष तथा संकल्पादि शब्दार्थो का साक्ष…
- Verse 14शुद्ध कैवल्यात्मक बोध संकल्प के क्षय से सिद्ध होता है, यह कहते है । सम्यग् ज्ञानोदय में…
- Verses 15–19शुद्ध ब्रह्म कारण नहीं हो सकता, इससे दृश्य पदार्थो का अभाव है - दृश्य पदार्थो का अभाव निश…
- Verse 20अब वह मुक्ति में कैसे स्थित है, उसे कहते है। संकल्प के नष्ट हो जाने पर सामने स्थित संकल्प…
- Verses 21–22तब अचल ब्रह्म में जगत्-स्पन्दन का प्रत्यय कैसे होता है, इस पर कहते हैं। जैसे वज़शिला के…
- Verse 23“जगच्छब्दार्थरहितं यः पश्यति स पश्यति“ यह जो कहा है उसकी दृष्टान्तपूर्वक व्याख्या करते है…
- Verses 24–25“रूपालोकमनस्काराः“ इसकी भी व्याख्या करते है । बोध से ब्रह्मरूप जगत् के ये बाह्य रूपदर्शन…
- Verses 26–27“सर्ग शब्द के अर्थभूत भेद का वाध हो जानेपर सृष्टि ओर पर्रह्म में ऐक्य ही भासित होता है, इ…
- Verses 28–30तब अशब्द वस्तु में ब्रह्मशब्द की प्रवृत्ति कैसे होती है, इस पर कहते हैं। समस्त शब्दभावना…