Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 99, Verses 28–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 99, verses 28–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 28-30
संस्कृत श्लोक
समस्तशब्दशब्दार्थभावनाभावनोदयम् ।
शुद्धं तिष्ठति चिद्व्योम ब्रह्मशब्देन कथ्यते ॥ २८ ॥
सम्यग्दर्शनसंसिद्धावुभयोरप्यवेदने ।
यच्छिष्टमजरं शान्तं ततो वाग्विनिवर्तते ॥ २९ ॥
संशान्तसर्वात्मकवेदनौघमस्तीदमेकात्मकस्वस्वरूपम् ।
यथास्थितं सर्वजगत्स्वरूपं पाषाणरूपं च परं ज्ञरूपम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
तब अशब्द वस्तु में ब्रह्मशब्द की प्रवृत्ति कैसे होती है, इस पर कहते हैं।
समस्त शब्दभावना और समस्त शब्दार्थभावना से अभिव्यक्त शुद्ध चिदाकाश ही अवस्थित रहता
है वही ब्रह्मशब्द से कहा जाता है । थोड़े भी परिच्छेद का स्वीकार कर लेने पर "वृह" धातु के अर्थ में
संकोच हो जायेगा, अत: अशब्द शब्द से जैसे कहा जाता है वैसे ही ब्रह्मशब्द से भी वही कहा जाता है,
यह भाव है। अथवा जगत्-शब्द के सदृश ब्रह्मशब्द का जो वाच्यभूत अर्थ है उसको जान लेने के बाद
लक्षणा द्वारा अखण्डार्थरूप सम्यगूज्ञान सिद्ध हो जाने पर जो अवशिष्ट अज, शान्त आत्मवस्तु रहती
है उससे ब्रह्मशब्दादि वाणी भी निवृत्त हो जाती है । हे राजन्, तत्त्वज्ञान हो जानेपर यह समस्त
जगत्स्वरूप जो यथास्थित है, वह अतिदढ वज्रपाषाणरूप परब्रह्मस्वरूप ही है ओर जिस दशा में
अज्ञान के कारण “में सर्वात्मक हूँ” यह ज्ञान नहीं हुआ, उस दशा में भी एकात्मक स्वस्वरूप होकर रहता
ही हे, इसलिए ब्रह्म ओर जगत् की एक ही सत्ता हे