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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 99, Verses 15–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 99, verses 15–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 15-19

संस्कृत श्लोक

अप्रतर्क्ये स्वरूपे हि नास्ति कारणता शिवे । कारणाभावतः कार्यपदार्थोऽपि न विद्यते ॥ १५ ॥ पदार्थाभावसंसिद्धौ वेदनं नोपपद्यते । कारणाभावतो नित्यमहंभावस्य नोदयः ॥ १६ ॥ अहंभावानुदयतः संसारः कस्य कीदृशः । संसाराभावतः सर्वं परमेवावशिष्यते ॥ १७ ॥ यदिदं भासते तत्सत्परमेवात्मनि स्थितम् । परं परे परापूर्णं सममेव विजृम्भते ॥ १८ ॥ तेन निस्तिमितं सर्वं शिलाकीर्णमिवाचलम् । विद्धि रश्मिमयाकारमिव ब्रह्म जगत्स्थितम् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

शुद्ध ब्रह्म कारण नहीं हो सकता, इससे दृश्य पदार्थो का अभाव है - दृश्य पदार्थो का अभाव निश्चित होने से संकल्प का क्षय हो जाता है, संकल्प के क्षय से अहंभाव का क्षय हो जाता है और अहभाव के क्षय से जीवभावादिरूप संसार का क्षय हो जाता है; उसके बाद एकमात्र ब्रह्म अवशिष्ट रह जाता है, इस क्रम को बतलाते हैं। अप्रतर्क्यस्वरूप शिव में कारणता नहीं है, कारण के अभाव से कार्य पदार्थ भी नहीं है, कार्य पदार्थों के अभाव की सिद्धि होने पर उनका ज्ञान (संकल्प) सिद्ध नहीं है और संकल्परूप कारण के अभाव से अहंभाव का भी उदय नहीं हो सकता । अहम्भाव का उदय न होने से किसका कैसा संसार ? ओर संसार के अभाव से सर्वात्मक केवल परब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है । ज्ञान से पहले भी जो यह जगद्रूप से अवभासित होता था वह परमार्थरूप से ब्रह्म ही उस तरह से अवस्थित था। तत्त्वबोध से कोई अपूर्व नहीं प्रकट होता, किन्तु परब्रह्मस्वरूप स्वभाव में स्थित परब्रह्म ही परब्रह्म से अपूर्वं स्वरूप ही प्रकट होता है। उस (सदैकरूपत्व) हेतु से जो सर्वात्मक वस्तु है, वह वज़शिला से निबिडित (परिपूर्ण) यानी वज़शिला के उदर की नाई दृढ़ और स्थिर है, उसमें स्थित जो जगत्‌ है, उसे वज़मणि के रश्मिमय हजारों प्रतिबिम्बों के आकारों के सदृश जानिये