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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 99, Verses 24–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 99, verses 24–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 24,25

संस्कृत श्लोक

नीरसा असदाभासा जगत्प्रत्ययकारिणः । रूपालोकमनस्काराः सन्तीमे ब्रह्मरूपिणः ॥ २४ ॥ ऊर्मिशब्दार्थरहितं यादृगम्बु बहून्यपि । सर्गशब्दार्थरहितं तादृग्ब्रह्म निसर्गवत् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

“रूपालोकमनस्काराः“ इसकी भी व्याख्या करते है । बोध से ब्रह्मरूप जगत्‌ के ये बाह्य रूपदर्शन तथा आन्तरिक मानसिक कल्पनाएँ, जो जगत्‌ की प्रतीति करानेवाली है; नितान्त असद्रूप से अवभासित हो जाती हें । जिस तरह समुद्र में अनेक भी तरंग आदि तरंगशब्दार्थ से रहित जलमात्र ही हैं; उसी तरह बहुत-सी वस्तुएँ ज्ञान का उदय होने पर सर्गशब्दार्थ से रहित सर्गशून्य एकमात्रब्रह्म ही हैँ