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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 99, Verses 1–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 99, verses 1–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 1-4

संस्कृत श्लोक

शिखिध्वज उवाच । नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्महामुने । स्थितोऽस्मि गतसंदेहो विश्रान्तमतिरात्मवान् ॥ १ ॥ ज्ञातज्ञेयो महामौनी तीर्णमायामहार्णवः । शान्तोऽहमनहंरूपो ज्ञः स्थितोऽस्मि निरामयः ॥ २ ॥ अहो नु सुचिरं कालं प्रभ्रान्तोऽहं भवाम्बुधौ । स्थानमक्षयमक्षुब्धमधुना प्राप्तवानहम् ॥ ३ ॥ एवं स्थिते मुने नास्ति साहंतादिजगत्त्रयम् । मूर्खबुद्धमिदं भाति यत्तद्ब्रह्मेति वेद्म्यहम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह बोधित हुए राजा शिखिध्वज-उपदेशजन्य ज्ञान से सम्पूर्ण सन्देह आदि का बीज मेरा अज्ञान नष्ट हो गया - यों शब्दोच्चारण कर दिखलाते है। राजा शिखिध्वज ने कहा : हे महामुने, आपकी दया से मेरा मोह नष्ट हो गया, मुझे स्मृति (विस्मृत हुए आत्मा का साक्षात्कार) लब्ध हो गई, मेरा सन्देह दूर हो गया; मेरी बुद्धि विश्रान्त हो गई, मैं आत्मवान्‌ होकर अब स्थित हूँ। भगवन्‌, अब मैंने ज्ञेय वस्तु का ज्ञान कर लिया, महामौनी हो गया, मायारूपी महासमुद्र को पार कर गया; अब मैं शान्त हूँ, मैं अहंकारस्वरूप नहीं हूँ, आत्मज्ञानी बनकर सर्वविध विकारों से शून्य होकर अवस्थित हू । अहो, अति चिरकाल तक मैं भवसागर में परिभ्रमण करता रहा, परन्तु अभी मैं अक्षुब्ध अक्षय स्थान को प्राप्त हुआ हूँ हे मुने, इस तरह अवस्थित होने पर मूर्खो से अवबुद्ध अहन्तासहित ये तीनों जगत्‌ नहीं हैं जो कुछ यह भासित हो रहा है उसे मैं ब्रह्मरूप ही जानता हूँ

सर्ग सन्दर्भ

अद्वानबेवाँ सर्ग समाप्त निनानबेवाँ सर्ग स्थूणानिखनन न्याय से बोध को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रबुद्ध हुए भी राजा शिखिध्वज को कुम्भ द्वारा पुनः बोधित करना।