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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 98

16 verse-groups

  1. Verse 1सत्तानबेवाँ सर्गे समाप्त अद्भानवेवां सर्ग चित्त है ही नहीं, इस ज्ञान को दृढ़ बनाने के निम…
  2. Verse 2कुम्भ ने कहा : हे राजन्‌, चित्तनाम का पदार्थ किसी काल में, किसी देश में या किसी वस्तुरूप…
  3. Verse 3चूँकि सम्पूर्ण चित्त आदि प्रपंच अज्ञानात्मक है, इसलिए उसका अस्तित्व ही नहीं है, क्योकि जो…
  4. Verse 4जो कुछ भी यह उदित जगत्‌ है, वह कुछ है ही नहीं, यहाँ यदि कुछ है, तो सब ब्रह्म ही है, अतः क…
  5. Verse 5उक्त अर्थ में “न निरोधो न चोत्पत्तिः“ इत्यादि श्रुति का प्रमाणरूप से उद्धरण करते हैं। प्र…
  6. Verses 6–7प्रकृत अर्थ के साधन में पूर्वोक्त युक्ति भी समर्थ है। उपादान आदि कारणरूप से जो प्रसिद्ध ह…
  7. Verses 8–9यदि सर्ग आदि वास्तव में नहीं है, तो (तदात्मानं स्वयमकुरुत', एको वशी सर्वशभ्ूतान्तरात्मा',…
  8. Verse 10इस प्रकार जगदुत्पत्ति की असिद्धि होने पर प्रतिज्ञात अर्थ की सिद्धि अनायास सिद्ध है, यह कह…
  9. Verse 11जगत्‌ की असत्ता में विषयों की असत्ता से भी चित्त की सत्ता नहीं है, यह कहते हैं। चित्त तो…
  10. Verse 12तब चित्तादि व्यवहार का विषय कौन है ? माया से उपहित ब्रह्म ही है, यह कहते हैं। जो यह स्वयं…
  11. Verse 13चेतो हि वासनामात्रम्‌* इत्यादि श्लोक की व्याख्या करते हैं। पहले तो कारण के अभाव से ही यह…
  12. Verse 14यदिदं कचति“ इत्यादि श्लोक का भी, परमार्थदृष्टि से उसके फल-वर्णन में तात्पर्य है, यों व्या…
  13. Verses 15–23हैं ही नहीं, यह कहनेवाला उन्मत्त ही हो सकता हे । जिसकी बुद्धि में लोक, शास्त्र और वेद प्र…
  14. Verse 24तब श्रुति में उक्तब्रह्मकारणतापक्ष का ही अवलम्बन कीजिए, इस पर कहते हैं। साकार तथा प्रतिघा…
  15. Verse 25निराकार ब्रह्म में कारणत्व का प्रतिपादन करनेवाली श्रुति का तात्पर्य ˆ तदनन्यत्वमारम्भण- श…
  16. Verses 26–30अब समस्त सृष्टिप्रतिपादक श्रुतियों का और “नेति नेति" इत्यादि सृष्टिनिराकरण करनेवाली श्रुत…