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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

यदिदं कचति ब्रह्म स्वयमात्मात्मनात्मनि । कृतं तस्यैव तेनैव चित्तमित्यादिनामकम् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

तब चित्तादि व्यवहार का विषय कौन है ? माया से उपहित ब्रह्म ही है, यह कहते हैं। जो यह स्वयं ब्रह्मस्वरूप आत्मा अपने ही स्वरूप से अपने में स्फुरित होता है, उसीके चित्त आदि नाम हैं और उसीने उनकी रचना भी की है