Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
चेतो हि वासनामात्रं वास्ये तु सति वासना ।
वास्यं जगत्तदेवासदतश्चित्तास्तिता कुतः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् की असत्ता में विषयों की असत्ता से भी चित्त की सत्ता नहीं है, यह कहते हैं।
चित्त तो वासनामात्ररूप है, वासना तब होती है, जब कि वास्य यानी वासना का कर्म (विषय) रहे ।
परन्तु वासना का कर्म जो जगत् है, वह तो स्वयं असत् है, अतः चित्त का अस्तित्व ही कहाँ ?