Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
कुम्भ उवाच ।
चित्तं नास्त्येव हे राजन्कदाचित्किंचन क्वचित् ।
यच्चेदं चित्तवद्भाति तद्ब्रह्माभिधमव्ययम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
कुम्भ ने कहा : हे राजन्, चित्तनाम का पदार्थ किसी काल में, किसी देश में या किसी वस्तुरूप में कहीं
है ही नहीं और जो यह चित्त-सा मालूम पड़ रहा है, वह ब्रह्मनाम की अविकारी वस्तु ही है