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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, Verses 8–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, verses 8–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 8,9

संस्कृत श्लोक

अनाख्येऽनाकृतौ देवे करोतीदमिति त्वसत् । भाषितं नोपपत्त्यात्म न सत्यं नानुभूयते ॥ ८ ॥ अनाख्योऽप्रतिघः स्वात्मा निराकारो य ईश्वरः । स करोति जगदिति हासायैव वचोऽधियाम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि सर्ग आदि वास्तव में नहीं है, तो (तदात्मानं स्वयमकुरुत', एको वशी सर्वशभ्ूतान्तरात्मा', “एकं बीजं बहुधा यः करोति', कर्ता भोक्ता महेश्वरः“ इत्यादि श्रुति-स्मृति-वचनों का प्रयोजन क्या ? यदि यह शंका हो, तो उसका समाधान यह है कि नेह नानास्ति किचन“ इस श्रुति में अपेक्षित निषेध्य का समर्पण कर अद्वैततत्त्व का व्युत्पादन करना ही उनका प्रयोजन है, तत्त्वार्थता उनमें नहीं है, इस आशय से कहते हैँ । जो देव नामरहित और रुपरहित हे, उस ब्रह्मरूप देव के विषय में कहना कि यह देव इस असदात्मक जगत्‌ का निर्माण करता है वह न तो युक्त्यात्मक है, न सत्य है और वैसा न तो लोगों का अनुभव हे जो स्वात्मा ईश्वर है, वह निराकार, अनाम और किसी दूसरे से आहत न होनेवाला है, इसलिए वह जगत्‌ करता है, इत्यादि जो तात्पर्यशून्य अर्थवादों की सर्वज्ञ के विषय में उक्ति है, वह केवल उपहास के लिए ही है