Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
इत्थमालक्ष्यमाणं तत्तदेवं सततं मुने ।
न च नार्थक्रियाकारि भवेन्नेत्थमिदं जगत् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
निराकार ब्रह्म में कारणत्व का प्रतिपादन करनेवाली श्रुति का तात्पर्य ˆ तदनन्यत्वमारम्भण-
शब्दादिभ्यः“ इत्यादि बादरायणन्याय से जगत् तत्वतः ब्रह्मरूप ही है, इस अर्थ में पहले कहा ही जा
चुका है । इस तरह ब्रह्मरूप से लक्ष्यमाण जगत् व्यवहार में, मूर्तरूपता का विनाश न होने से, अथक्रिया
में समर्थ है ही, इसलिए लोकविरोध नहीं हो सकता। परमार्थ से तो ब्रह्मरूप ही जगत् है, मूढद्वष्टिवालों
के मत में प्रसिद्ध जो उसका रूप है, तद्रूप नही, अतः वेदविरोध भी नहीं है, इस आशय से कहते हैं।
हे मुने, इस तरह अप्रसिद्धरूप से (अकारणत्वादिरूप से) लक्ष्यमाण ब्रह्म सदा ही तत्स्वरूप हे ।
इस तरह सिद्धान्त होते हुए भी व्यवहार में जगत् अर्थक्रिया में समर्थ नहीं हे, यह भी नहीं है ओर परमार्थ
में जगत् ब्रह्मरूप नहीं हे, यह भी नहीं हो सकता