Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
अतोऽज्ञानात्मकं यत्तज्जगदेव न विद्यते ।
तत्राहंत्वंतदित्यादिकल्पिताः कलनाः कुतः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि
सम्पूर्ण चित्त आदि प्रपंच अज्ञानात्मक है, इसलिए उसका अस्तित्व ही नहीं है, क्योकि जो अज्ञानात्मक
वस्तु रहती है, उसका ज्ञान से बाध हो जाता है। अत: अधिष्ठान ब्रह्म में अहम्, त्वम्, तत् इत्यादि कल्पित
सजावट कैसे रह सकती है ? निचोड यह है ~ स्वात्मा में तभी क्रियाविरोध होता, जब कि अज्ञानबाध
के सिवा दूसरा कोई चित्तादि का बाध होता। किन्तु ऐसा तो है नहीं, क्योंकि अज्ञानबाध ही अज्ञानकार्य
आदिकी निवृत्तिरूप है, अतः अज्ञानबाध की स्थिति में चित्त का अस्तित्व ठहर सकता ही नहीं । अतएव
फिर अन्धत्व आदि दोष हो भी सकते नहीं, क्योकि अज्ञान ही सर्वान्धत्व का प्रयोजक है; अज्ञानबाध होने
परस्वप्रकाश पूर्णानन्द का अवशेष रहने से निरतिशय पुरुषार्थ सिद्ध ही हो जाता है। चित्त के अधीन चैतन्य
है भी नहीं, किन्तु अभिव्यक्त चिति के अधीन चैतन्य है, इस प्रकार का चैतन्य जीवन्मुक्तों में, चित्त का
नाश होनेपर भी है ही; अतः जीवन्मुक्त अचेतन नहीं हो सकते। चित्त का विनाश हो जाने पर चित्तकृत
चिति की अभिव्यक्ति भाग जायेगी, यह कहना तो सुविचारमूलक हो नहीं सकता, क्योकि अनभिव्यक्त
अज्ञानरूप आवरण के ही कारण रहती है। जब आवारक अज्ञान ही हट गया, तब चिति की अभिव्यक्ति
स्वाभाविक होने से उसकी अनभिव्यक्ति हो ही नहीं सकती, मेघ के आवरण का विनाश कर वायु द्वारा
की गई सूर्य की अभिव्यक्ति शरत्काल में वायु के न रहने पर क्या नष्ट हो जाती है ? अर्थात्
नहीं, सूर्याभिव्यक्ति बनी ही रहती है, बस यही न्याय प्रकृत में है