Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 97

छियानबेवाँ सर्ग समाप्त यत्तानबेवाँ सर्ग पूर्व सर्ग में कारणशून्य दृश्य उत्पन्न ही नहीं हुआ है, यह कहकर दृश्य का परिमार्जन किया गया, अब चिति के दृश्यज्ञानत्व का प्रयत्नपूर्वक परिमार्जन किया जाता है ।

11 verse-groups

  1. Verses 1–2इस प्रकार पूर्व सर्ग के बीसवें श्लोक में कहा गया समुद्रतरगद्ष्टान्त ओर उसका अवान्तर वैषम्…
  2. Verse 3दृश्य की असत्ता भले ही हो, परन्तु उसकी असत्ता होने पर विशुद्ध चैतन्य में दृश्यानुभवरूपता…
  3. Verse 4आकाश में विस्तृत सूर्यप्रकाश में अध्यस्त गन्धर्वनगर आदि की प्रकाशरूपता जैसे प्रतीत होती ह…
  4. Verse 5इस विषय में विज्ञानवादी बौद्धों का यह मत है ~ भवन आदि जितने पदार्थ हैं, वे सब भीतरी ज्ञान…
  5. Verse 6जिस तरह जल में द्रवत्व सारभूत वस्तु है, उसी तरह सब पदार्थों की सारभूत वस्तु चैतन्य ही है।…
  6. Verse 7यदि वह स्वच्छ और अस्वच्छ दोनों स्वभावों से रहता है, तो उसमें स्वच्छस्वभावमात्रता की व्यवस…
  7. Verses 8–9यदि शंका हो कि अस्वच्छभाव का सर्वथा अपलाप क्यो करते हैं - स्वच्छ चिद्रूप ही अस्वच्छ जगत्भ…
  8. Verses 10–11चिति के अध्यास के बिना दूसरे किसी भी उपाय से सृष्टि की उपपत्ति नहीं हो सकती, यह कहते हैं…
  9. Verse 12तव अकारणक ही यह जगत्‌ माना जाय, इस तरह के यद्च्छावादिपक्ष का निरास करते है। कारण का अभाव…
  10. Verses 13–14तब चिद्रूप ही जगत्‌ ओर उसका कारण चिद्रूप ही ब्रह्म है । यदि कहो कि चिद्रूप की एकता में यह…
  11. Verses 15–21यदि सव कुछ चैतन्यैकरसरूप है, तब चित्‌ ओर अचित्‌ यो द्विविध उपलम्भ कैसे होता है, इस पर कहत…