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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

कुम्भ उवाच । हेम्न्यस्ति देशकालान्ते इत्थं जन्यजनिक्रमः । न किंचिज्जायते शान्तान्न किंचित्प्रविलीयते ॥ १ ॥ स्वसत्तायां स्थितं ब्रह्म न बीजं न च कारणम् । शुद्धानुभवमात्रं तत्तस्मादन्यन्न विद्यते ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार पूर्व सर्ग के बीसवें श्लोक में कहा गया समुद्रतरगद्ष्टान्त ओर उसका अवान्तर वैषम्य दृश्यमार्जन में उपयोगी है, यो कहकर उसका उपपादन किया, अब इक्कीसरवे श्लोक में उक्त सुवर्णकटक दृष्टान्त ओर उसके अवान्तर वैषम्य का उसी प्रकार उपपादन करना चाहिए, यह कहने के लिए कुम्भ अनुवाद करते है । कुम्भ ने कहा : हे महाराज, देश और काल से परिच्छिन्न सुवर्ण में इसी तरह का कल्पित जन्यजनक क्रम है यानी कटकादि को लेकर जन्यजनकभाव की उपपत्ति की गई हे । शान्त स्वभाव से विचारने पर तो न कुछ उत्पन्न होता है और न कुछ विलीन ही होता हे । अपनी ही सत्ता में अवस्थित ब्रह्म न किसीका उपादान कारण है ओर न किसीका निमित्त कारण है, वह केवल विशुद्ध अनुभवरूप है, अनुभवरूप उससे भिन्न दूसरा कुछ भी पदार्थ है नहीं, जो कुछ अहन्ता आदि जगत्‌ पदार्थ भासता है, वह भी असीम ब्रह्मरूप ही हे

सर्ग सन्दर्भ

छियानबेवाँ सर्ग समाप्त यत्तानबेवाँ सर्ग पूर्व सर्ग में कारणशून्य दृश्य उत्पन्न ही नहीं हुआ है, यह कहकर दृश्य का परिमार्जन किया गया, अब चिति के दृश्यज्ञानत्व का प्रयत्नपूर्वक परिमार्जन किया जाता है ।