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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

किंचिज्जगदहंतादि तदेवानन्तमस्ति हि । शिखिध्वज उवाच । शिवे जगदहंतादि मुने नास्तीति वेद्म्यहम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

दृश्य की असत्ता भले ही हो, परन्तु उसकी असत्ता होने पर विशुद्ध चैतन्य में दृश्यानुभवरूपता की जो प्रतीति होती है, उसकी उपपत्ति कैसे होगी ? यो राजा प्रश्न करते हैं। राजा शिखिध्वज ने कहा : मुनिवर, मेँ मानता हूँ कि आनन्दात्मक चैतन्य में अहन्तादि दुःखप्रचुर जगत्‌ नहीं रहता, परन्तु उसमें जो सग्विदन भासित होता है, वह किस कारण से होता है, उसे शीघ्र मुझसे कहिए