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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, Verses 13–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, verses 13–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 13,14

संस्कृत श्लोक

द्वित्वैक्याद्यात्मकं व्योमपुष्पवत्स्वानुभूतितः । वस्तु नाशैकनिष्ठत्वान्न वा ज्ञमुपपद्यते ॥ १३ ॥ उपलम्भकरो नाशो जन्मनस्तस्य वा कुतः । अथ चैनं सदा सन्तं नित्यं नष्टं च वेत्सि वा ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

तब चिद्रूप ही जगत्‌ ओर उसका कारण चिद्रूप ही ब्रह्म है । यदि कहो कि चिद्रूप की एकता में यह कार्य और यह कारण, यों विभाग करनेवाला कौन होगा, तो जन्म और नाश ही कार्या-कारण का विभाग करनेवाले होगे, इस पर कहते है । घट, पट आदि जागतिक वस्तु चिद्रूप नहीं हो सकती, क्योकि जागतिक वस्तुओं का नाश अवश्यम्भावी हे । चिति का नाश चिति से तो हो नहीं सकता, क्योकि नाशकाल में यदि चिति की सत्ता मान ली जाय, तो "चितिनाश' शब्द का कोई विषय ही नहीं होगा । जडवस्तु से भी चिति का नाश नहीं माना जा सकता, क्योकि जडवस्तु चितिनाश में समर्थ नहीं हे । यदि कहो कि चिति का नाश भी चिद्रूप ही है, अतः अपने ओर दूसरे के प्रकाशन में दूसरे की अपेक्षा नहीं रखता, तो यह भी युक्त नहीं हे, क्योकि चिद्रूप चितिविनाश स्वोत्पत्ति ओर स्वप्रतियोगी का प्रकाशक किस तरह हो सकेगा ? अपनी उत्पत्ति और उत्पत्तिपूर्वकालिक प्रतियोगी चैतन्य दोनों का उक्त नाश परिज्ञान कर नहीं सकता । अपनी उत्पत्ति ओर प्रतियोगी के ज्ञान के सिवा उसका नाश स्वयं उत्पन्न हुआ, यह नहीं कहा जा सकता साक्षी से स्वोत्पत्ति ओर स्वप्रतियोगी का ज्ञान तो हो नहीं सकता, क्योकि चिति का विषय चिति नहीं होगी, अतः उसके वेद्यभूत उत्पत्ति विनाश ओर जगत्‌ में जडता ही सिद्ध है, इस प्रकार जगत्‌ में जडता सिद्ध हो जाने पर कारण का निरूपण न होने से कारण के बिना यदि उत्पत्ति मानी जाय, तो सदा ही जन्म और सदा ही विनाश होने लगेगा, क्योकि जन्म ओर विनाश का निवारक तो कोई है नहीं । यदि आप (स्वभाववादी) पदार्थो को यों ही प्रमाणशून्य एवं अनुभवविरुद्ध नित्य-उत्पत्तिस्वभाव ओर नित्य विनाशस्वभाव मानतेहै, तो श्रुतिप्रमाणानुसार एवं विद्वानों के अनुभव से सिद्ध अखण्ड चैतन्यैकरूप स्वीकार करने मेँ आपको कोन पीडा है, यह बतलाइये