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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

स्वात्मनीशमनन्तं तद्यथास्थितमवस्थितम् । प्रतियोगिव्यवच्छेदाभावतः सत्त्वभावयोः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि वह स्वच्छ और अस्वच्छ दोनों स्वभावों से रहता है, तो उसमें स्वच्छस्वभावमात्रता की व्यवस्था कैसे होगी, इस पर कहते हैं। सत्त्वमात्र का जो स्वभाव है, वही स्वच्छभाव है और सत्व का विरुद्धभाव अस्वच्छभाव है, अस्वच्छभाव अपने विरोधी सत्त्व का हनन करे चाहे न करे - दोनों ओर से उसकी सिद्धि ही नहीं है अतः सत्त्व और उसके विरोधी अस्वच्छभाव एवं असत्त्व की, प्रतियोगी और व्यवच्छेद का अभाव होने से, अस्वच्छता न होने के कारण परा चिति में स्वच्छभाव की व्यवस्था स्वभावतः सिद्ध हो जाती है