Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
वेदनामात्रसारत्वाद्यथा चित्सार उच्यते ।
द्रवत्वं सलिलस्येव चिदचित्त्वमकारणम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस तरह जल में द्रवत्व सारभूत वस्तु है, उसी तरह सब पदार्थों
की सारभूत वस्तु चैतन्य ही है। यदि चैतन्य नाम की वस्तु नहीं होगी, तो साधक के अभाव से सब जगत्
“है या नहीं है" इस प्रकार के व्यपदेश के लिए क्या अयोग्य होगा, यह विचार करने की बात है। इसी तरह
रसभूत चिति की अचितिता कारण के बिना निरूपित नहीं की जा सकती। वह अनन्त चितिरूप माया
द्वारा अपने स्वरूप मे जगत् के आकार से या परमार्थ चैतन्यमात्ररूप से प्रकाशित करने में समर्थ है,
अतः वह विद्यायुक्त या अविद्यायुक्त जैसा भी रहता है, वैसा ही प्रतीति से भी अवस्थित है