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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, Verses 15–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, verses 15–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 15-21

संस्कृत श्लोक

पदार्थौघं तदेवेत्थमेकरूपेऽपि किं व्यथा । उपलम्भस्तु यश्चायमेषा चित्तचमत्कृतिः ॥ १५ ॥ चित्तत्त्वमात्रसत्तास्ति द्वित्वमैक्यं च नास्त्यलम् । अतः पदार्थसत्ताया अभावे सति भूपते ॥ १६ ॥ असंभवाद्भावनस्य नाहंताभावनास्ति ते । अहंभावासंभवतश्चित्तमन्यत्किमुच्यते ॥ १७ ॥ इति चित्तमहंरूपं नास्त्यतो न च भिन्नता । निर्वासनः शान्तमना मौनी परनभोमयः ॥ १८ ॥ सदेहो वा विदेहो वा भावस्थोऽप्यचलोपमः । संबन्धाच्छुद्धचिद्दृष्टेः पदार्थाभावसिद्धितः ॥ १९ ॥ भावनाभावतश्चित्ते नास्त्येवाहमिति स्वयम् । एवं ब्रह्मेति वेदार्थभावनादनुभूतितः । चेतितार्थैकसत्यत्वाच्चिन्ता नाम क्व विद्यते ॥ २० ॥ तेनासि निर्मलमकारणमादिमुक्तं तद्ब्रह्म शाश्वतमशेषमनेकमेकम् । शून्यं निरामयमसत्सदनादिमध्यं सर्वं जगच्चिदपि ब्रह्म यथास्थितं तत् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि सव कुछ चैतन्यैकरसरूप है, तब चित्‌ ओर अचित्‌ यो द्विविध उपलम्भ कैसे होता है, इस पर कहते हैं। साधो, यह चित्‌ है और यह अचित्‌ है, इस प्रकार का यह जो उपलम्भ होता है वह केवल चित्त की चमत्कृति है, दूसरा कुछ भी नहीं हे । संसार में केवल चितित्त्व की ही सत्ता हे । द्वित्व ओर एकत्व कुछ नहीं है, केवल कल्पनामात्र हे । हे राजन्‌, इससे पदार्थसत्ता का अभाव होने पर उनकी भावना की असत्ता अनायास सिद्ध हो जाती है। सम्पूर्ण भावनाओं की असत्ता होने पर तो आपकी अहम्भावना का अस्तित्व कैसे रह सकता है ? अहम्भाव के असम्भव से फिर दूसरा बचता ही कौन है ? जिसे कि चित्त कहा जाय । इसलिए चित्त ही अहंरूप है, अहमर्थ से भिन्न दूसरा चित्तनामक पदार्थ है ही नहीं और जीव-ब्रह्मभेद तथा दृश्य-दृक्‌ का भेद भी नहीं है । अतः वासना से रहित, शान्त मन से युक्त और बाहर की वाणी से रहित हो जाने पर आप परम चिदाकाशमय होकर अवशिष्ट हो जाते हैं, आप सदेह होवे, चाहे विदेह होवे, चाहे अनेक पदार्थों के बीच में रहें, तो भी पर्वत के समान अटलरूप ही हैं, आपमें कुछ भी विक्रिया नहीं है। शुद्ध चैतन्यदृष्टि के सम्बन्ध से, जड़ पदार्थ की कदापि सिद्धि न होने के कारण, जड़ पदार्थों की भावना का भी अभाव हो जाने से भावनाजनित जीवरूप रहता ही नहीं, केवल स्वयं आत्मा ही अवशिष्ट रहता है। "सब ब्रह्मस्वरूप ही है" इत्यादि वेदार्थभावना से जनित ब्रह्मसाक्षात्कार द्वारा केवल ब्रह्मरूप अर्थ के ही प्रकाशित हो जाने पर फिर बेचारी चिन्ता का अस्तित्व ही कहाँ रहा ? । सब द्वैत का वाध हो जाने के कारण आप ब्रह्मरूप ही हैं, वह ब्रह्म निर्मल, कारणशून्य ओर आरम्भ से मुक्त हैं, वह शाश्वत है, निरामय हे, आदि और मध्य से रहित है । वह एक होता हुआ भी अनेकरूप हुआ है, वास्तव में जगत्‌ असत्‌ ओर शून्य है । जगत्प्रतिभासरूप चिति भी अविकृत ब्रह्म ही है, अतः अन्त में वही अवशिष्ट रहता है, यह तात्पर्य हे