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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

सर्गवेदनमाभाति कथमेतद्वदाशु मे । कुम्भ उवाच । विस्तारं तदनाद्यन्तं तत्संविदिव तिष्ठति ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

आकाश में विस्तृत सूर्यप्रकाश में अध्यस्त गन्धर्वनगर आदि की प्रकाशरूपता जैसे प्रतीत होती है, वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिए, इस आशय से कुम्भ कहते हैं। कुम्भ ने कहा : साधो, असीम जगत्‌ का विस्तार करनेवाला जो अधिष्ठान सद्रूप अनादि अनन्त ब्रह्म है, वह सृष्टि के ज्ञान के सदृश बनकर अवस्थित है, अतः उसमें अध्यस्त भुवन विशुद्ध अधिष्ठान्मात्रस्वरूप है, इसीलिए वही जगत्‌-शरीर कहा जाता है