Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 96
16 verse-groups
- Verses 1–2पंचानबेवाँ सर्गे समाप्त छियानबेवाँ सर्ग प्रबुद्ध हुए राजा को दृश्य-सत्ता का परिमार्जन, जि…
- Verses 3–8समस्त दृश्यों के, अधिक क्या कहें, अखण्डाकार वृत्ति के भी विलय के साथ हम निरतिशय ब्रह्मानन…
- Verse 9युक्ति-पूर्ण है और प्रश्नकर्ता आप कहे जानेवाले अर्थ के अवधारण मे प्ट भी हैं, यो प्रशंसा क…
- Verse 10सबसे पहले अध्यास की सामग्री बतलाने के लिए अध्यारोप कर संस्कारसहकृत अज्ञानशवल अधिष्ठान का…
- Verses 11–14कल्पान्त में एकमात्र बाकी बचे हुए अधिष्ठान को दिखलाते हैं। तदनन्तर जब कि महाकल्प का ताण्ड…
- Verses 15–18जितने छोटे-से-छोटे पदार्थ हैं, उनमें सबसे छोटा (सूक्ष्म) यही हे, जो स्थूल से भी स्थूल पदा…
- Verse 19अध्यासपक्ष में अधिष्ठान की सत्ता ही से कार्य ओर कारण दोनों में सत्ता का निर्वाह हो जाने क…
- Verses 20–27यह असत्-कार्यवादियों के मत में दीक्षित न हो जाय, इस अभिप्राय से केवल अधिष्ठानसत्ता से ही…
- Verses 28–30व्यवहार की दृष्टि में शब्द और शब्दार्थभूत समस्त पदार्थों का ही वह स्वरूपभूत है, अतः अपने…
- Verse 31इन सब बातों से अध्यासपक्ष मे किसीको भी जन्म आदि विकार की प्रसक्ति नहीं होती, केवल कूटस्थत…
- Verses 32–33"जलेस्ति देशकालान्ते“ इत्यादि जो पहले कहा गया था, उसीका आपने यहाँपर उपसंहार किया, परन्तु…
- Verses 34–38समुद्र पंचीकृत जल का कार्य है, अतः पंचीकृत जल के कारण भूतो के द्वारा तथा वायु आदि अन्य नि…
- Verses 39–44जैसे नेत्रों के दोष-विश्रमों से ज्वाला केशोण्ड्रक आदि रूपों में चित्र-विचित्ररूप से आविर्…
- Verse 45यदि पृथिवी आदि का वास्तव में अस्तित्व है नही, तो यः पृथिव्यां तिष्ठन्“ इत्यादि श्रुति से…
- Verse 46आवृत चैतन्यभाव ही मायिक नानारूप से अनेक-सा बनकर तत्-तत् कार्यरूप से उस प्रकार परिच्छिन्…
- Verses 47–52हो जाने पर पूर्ण ही अवशिष्ट रह जाता ह । हे साधो, जो चिन्मात्ररूप वस्तु में चिन्मात्र ही स…