Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, Verses 20–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, verses 20–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 20-27
संस्कृत श्लोक
जलेऽस्ति देशकालान्ते यथोर्म्यादि सकारणम् ।
परेऽसद्देशकालान्ते तथा जगदकारणम् ॥ २० ॥
हेम्न्यस्ति देशकालान्ते कटकादि सकारणम् ।
ब्रह्मण्यदेशकालान्ते तथा जगदकारणम् ॥ २१ ॥
ईदृशं तद्वरिष्ठं च जगद्राज्यं तदक्षतम् ।
न द्वैतममलं शान्तं जगत्तृणलवायते ॥ २२ ॥
ईदृशं तत्परं श्रेयस्तस्मिन्सति यदीश्वरे ।
जगत्पदार्थसार्थश्रीः सा सत्तामेति वेदनात् ॥ २३ ॥
तत्सारमेकमेवेह विद्यते भूपते ततम् ।
एकमेकान्तचित्कान्तं नैकमप्यद्वितावशात् ॥ २४ ॥
तस्माद्द्वितीया कलना काचिन्नाम न विद्यते ।
आत्मतत्त्वमलं भातं तदेवापूर्णमक्षयम् ॥ २५ ॥
संस्थितं सर्वदा सर्वं सर्वाकारमिवोदितम् ।
अदृश्यत्वादलभ्यत्वान्न तत्कार्यं न कारणम् ॥ २६ ॥
प्रत्यक्षादेरगम्यत्वात्किमप्येव तदुत्तमम् ।
सर्वं सर्वात्मकं सूक्ष्ममच्छानुभवमात्रकम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
यह असत्-कार्यवादियों के मत में दीक्षित न हो जाय, इस अभिप्राय से केवल अधिष्ठानसत्ता से
ही कार्य की ब्रह्म में त्रैकालिक सत्ता है, यह भी द्ष्टान्त देकर बतला रहे कुम्भ विशेष ज्ञातव्य दशति हैं।
देश और काल से परिच्छिन्न (भेद प्राप्त) जल में विद्यमान तरंग आदि जलरूप कारण को
लेकर जैसे सहेतुक हैं, उनकी जलसत्ता से अतिरिक्त सत्ता जैसे नहीं है, वैसे देश और काल से
अपरिच्छिन्न ब्रह्म मेँ प्रतीयमान जगत् सहेतुक नहीं है, क्योकि तरंगादिस्थल में आन्तरालिक
जलकारणता के सदृश यहाँ कोई आन्तरालिक कारण नहीं है, ब्रह्म तो मूलकारण ही है, अतः
निर्हेतुक की पृथक् सत्ता कैसे होगी ? किसी भी प्रकार से नहीं हो सकती । देश-काल-परिच्छिन्न
सुवर्ण में कटक आदि सुवर्णरूप कारण को लेकर सकारण हैं, उनकी जैसे पृथक् सत्ता नहीं है, वैसे
ही देशकालादि परिच्छेद से शून्य ब्रह्म में विद्यमान निर्हेतुक जगत् की भी ब्रह्म से पृथक् सत्ता नहीं
हो सकती । इसी तरह वह ब्रह्मरूप सारवस्तु श्रेष्ठ है, उसका समस्त जगत् के ऊपर साम्राज्य है,
वह अविनाशी, अद्वैत, निर्मल और परम शान्त है, समस्त जगत् उसके सामने तिनके के टुकड़े के
सदृश अति तुच्छ है । इसी प्रकार यह पर वस्तु ऐसी कल्याणरूप है, ईश्वररूप जिसके अस्तित्व से
प्रसिद्ध यह जगत्पदार्थों की शोभा अस्तित्व धारण करती है । हे राजन्, कल्पप्रलय के अनन्तर
अवशिष्ट रहनेवाली वह सारभूत वस्तु इस समस्त ब्रह्माण्ड में एक ही है, केवल वह चिन्मात्रत्वरूप
है, निरुपाधि प्रेम का आस्पद है । द्वितीय की सहिष्णुता न होने से यद्यपि वह एक है, तथापि एकत्व
की आश्रय नहीं है। इसलिए हे राजन्, कोई भी दूसरी कल्पना इस संसार में है ही नहीं। जो आपको
निर्मल आत्मतत्व अवगत हुआ है, वही परिपूर्ण ओर अविनाशी है। सम्पूर्ण आकार-प्रकारों से युक्त
होकर मानों उदित हुआ वह सर्वस्वरूप होकर सदा ही स्थित रहता है। इन्द्रियों से दृश्य न होने के
कारण तथा हाथ आदि से प्राप्य न होने के कारण वह न कार्य (ज्ञान और कर्म से जनित अतिशय
का आधार) है और न कारण (ज्ञान और कर्म का सम्पादक) है। प्रत्यक्ष आदि लौकिक प्रमाणो से
वेद्य न होने के कारण वह स्वानुभवमात्रगम्य कुछ अनिर्वचनीय ही उत्तम (निरतिशयानन्दात्मक)
वस्तु है, वह सबकी आत्मा है और सब इसकी आत्मा है। अतिसूक्ष्म, स्वच्छ तथा अनुभवमात्ररूप
है