Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, Verses 3–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, verses 3–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 3-8
संस्कृत श्लोक
कुम्भ उवाच ।
राजन्नज्ञाननिद्रातः प्रबुद्धोऽसि शिवः स्थितः ।
कार्यं नास्तमयेनैव न चानस्तमयेन ते ॥ ३ ॥
सकृदेव विभातात्मा नष्टानिष्टपदात्मकः ।
कलाकलननिर्मुक्तो जीवन्मुक्तोऽङ्ग सांप्रतम् ॥ ४ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
कुम्भेन बोधितस्त्वेवं स बभूवावबोधवान् ।
विनिर्गतो रराजोच्चैर्महामोहसमुद्गकात् ॥ ५ ॥
विश्रान्तधीः क्षणेनैव पश्यन्दृश्यस्य वस्तुनः ।
असत्तामेव मुक्तात्मा लीलया समुवाच ह ॥ ६ ॥
शिखिध्वज उवाच ।
ज्ञातप्रायमपीदं तु यत्पृच्छामि तदुच्यताम् ।
भूयो निपुणबोधाय मम मानद मोदद ॥ ७ ॥
शिवे शान्ते निराभासे पदेऽनुल्लसितात्मनि ।
द्रष्टृदर्शनदृश्याख्यो विश्वात्मा प्रत्ययः कुतः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
समस्त दृश्यों के, अधिक क्या कहें, अखण्डाकार वृत्ति के भी विलय के साथ हम निरतिशय ब्रह्मानन्द
के सागर में प्रविष्ट होने की इच्छा कर रहे थे, आपने बीच में व्यर्थ ही व्युत्थित कर विघ्न डाला, अव हमें
वहाँ प्रवेश मिलेगा ही नहीं, इस तरह राजा की कहने की इच्छा जानकर कम्भ कहते हैँ ।
कुम्भ ने कहा : हे राजन्, अब आप अज्ञानरूपी निद्रा से जाग गये हें ओर निरतिशयानन्दरूप
बनकर स्थित हैं, इसलिए अब न तो आपको समस्त दृश्यों के विनाश से कोई मतलब है ओर न
उनके अविनाश से ही कोई मतलब है, अर्थात् अज्ञान रहने पर परब्रह्मरूपी आनन्दसमुद्र में प्रवेश
नहीं हो सकता । जब अज्ञान का विनाश हो गया, तब तो दृश्यों का विनाश हो चाहे न हो, एक बार
देखा गया ब्रह्म सदा ही अनावृत्त ओर सुलभ रहता है । हे प्रिय, एक बार विस्पष्टरूप से देखा गया
आत्मा समस्त अनिष्टकारक वस्तुओं का आश्रय नहीं रहता यानी उस आत्मा में दुःखप्रद प्रपंच का
सम्बन्ध रहता ही नहीं, अब आप समस्त कल्पनारूपी कलनों से निर्मुक्त होकर जीवन्मुक्त बन गये
हँ । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामभद्र, जब मुनिश्रेष्ठ उस कुम्भ ने राजा शिखिध्वज को उस
तरह समझाया, तब वह बोधपूर्णं हो गया ओर महामोहरूपी पिटारी से बाहर निकल कर खूब शोभने
लगा। यद्यपि उसकी बुद्धि पूर्ण विश्रान्त हो चुकी थी, व्युत्थानकाल में भी क्षणमात्र में ही उसने समस्त
दृश्यों की असत्यता जान ली थी, तथापि उस मुक्तात्मा ने लीला से यानी कुम्भ के परिपक्र बोध के
साथ अपने बोध की तुलना करने की लीला से कुम्भ से कहा । राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मानदी,
हे आनन्ददायक, यद्यपि यह सब कुछ मेरा एक तरह से ज्ञातप्राय ही हो गया हे, तथापि बोध की
दृढता के लिए मैं आपसे जो कुछ प्रश्न करता हूँ, उसे फिर मेरे समक्ष कहिए । ब्रह्मरूप पद निरतिशय
सुखरूप, दुःखशून्य ओर अशुद्ध चेताओं से अगम्य है, उस पद के अविद्या से आवृत्त होने पर उसमें
द्रष्टा, दृश्य ओर दर्शन नामक यह विश्वरूप ज्ञान किस निमित्त से होता है ? क्या वह सत् निमित्त
से होता है या असत् निमित्त से ? सत् निमित्त से तो हो नहीं सकता, कारण कि सत्-वस्तु में विकार
आदि नहीं रहते, असत् से भी नहीं हो सकता, क्योकि उस बोध में सत्त्वका जो परिज्ञान होता है,
वह होगा ही नहीं