Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति ब्रह्मणि विश्रान्तिमवाप्य स शिखिध्वजः ।
मुहूर्तमासीत्संशान्तमना निर्वातदीपवत् ॥ १ ॥
निर्विकल्पसमाधानपरेणाशु विविक्षितम् ।
स्वलीलयेति कुम्भेन झटित्येव प्रबोधितः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
पंचानबेवाँ सर्गे समाप्त
छियानबेवाँ सर्ग
प्रबुद्ध हुए राजा को दृश्य-सत्ता का परिमार्जन, जिस उपाय से हो सकता है उस उपाय का वर्णन ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, राजा शिखिध्वज पूर्वोक्त रीति से परब्रह्म में विश्रान्ति
पाकर वायुशन्य प्रदेश में स्थित दीप के सदृश मुहूर्त काल तक निश्चलरूप से स्थित हो गये । अखण्ड
ब्रह्माकारवृत्ति का उदय होने से उनका मन तुच्छ बाह्य वृत्तियों से निर्मुक्त होकर प्रसन्न हो गया था।
अनन्तर राजा शिखिध्वज ने, जो निर्विकल्प समाधि में तत्पर थे, अखण्डाकारवृत्तिरूप विकल्प को
भी तिरस्कृत कर-क्षीरसमुद्र में गिरे हुए जलबिन्दु के सदृश, अन्तःकरण को ब्रह्मरूप बनाकर ब्रह्म
में एकरूप से जब प्रविष्ट होने की इच्छा की, तभी उस अवस्था को ताडकर अपनी सहज लीलाभरी
वाणी से कुम्भ ने उन्हें तत्काल जगाया