Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, Verses 47–52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, verses 47–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 47-52

संस्कृत श्लोक

नानात्मनैव नानेव स्वात्मज्ञानात्मनात्मवत् । पूर्णात्पूर्णान्युद्धरन्ति पूर्णात्पूर्णानि चक्रिरे ॥ ४७ ॥ भवन्ति पूर्णात्पूर्णानि पूर्णमेवावशिष्यते । चिन्मात्रमेव कचति यच्चिन्मात्रमयात्मनि ॥ ४८ ॥ अकचित्वैव तन्नाम कचितं सर्गवेदनम् । अहं चिता चिदेवादौ भवतीव स्वयं ततः ॥ ४९ ॥ अभवन्त्येव रूपं स्वमत्यजन्ती निरामयम् । तेजोमयमनाद्यन्तं मनोरूपमनन्तकम् ॥ ५० ॥ सम्राट्संसारमाभासि भवतीव स्वयं वपुः । पश्यत्यथ सदेवेदं स्वरूपत्वात्सदेव वा । भावनाद्भूततामेति दृश्यं भवति च क्षणात् ॥ ५१ ॥ शान्तं जगत्प्रसररूपतया स्वभावशब्दार्थमुक्तमिदमव्यपदेश्यमेकम् । वस्तु स्थितं निजचमत्करणावलोकरूपं जगत्स्वरहितानुभवात्मतत्त्वम् ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

हो जाने पर पूर्ण ही अवशिष्ट रह जाता ह । हे साधो, जो चिन्मात्ररूप वस्तु में चिन्मात्र ही सृष्टिज्ञान प्रथित होता है, वह वास्तव में प्रथित न होकर ही प्रथित होता है, यह महान्‌ आश्चर्य हे । अह प्रत्यगात्मरूप चिति ही सृष्टि के आरम्भ में अपना निर्विकार, तेजोमय आदिअन्तशून्य स्वरूप न छोडती हुई ही और न होती हुई ही स्वयं चैतन्य के द्वारा अनन्त मनोरूप मानों बन जाती है । तदनन्तर स्थूलता की कल्पना से आभासशील होकर वह स्वतः स्वयंभू का विराट्‌ -रूप संसार बन जाती है । तदनन्तर व्यष्टिजीव का स्वरूप धारण कर भ्रान्ति से जगत्‌ में सत्यता ही देखती है और परमार्थदशा में अधिष्ठान की सत्यता देखती है । पृथ्वी आदि भूतो की भावना से पृथ्वी आदि चार प्रकार के भूत बन जाती है ओर दृश्यभावना से तत्क्षण दृश्यरूप बन जाती है । हे महात्मन्‌, प्रशान्त, स्वभाव से ही शब्दों ओर अर्थो से निर्मुक्त, अतएव व्यपदेशशून्य, स्वप्रकाशरूप अनुभवात्मक, अद्वितीय वस्तु माया एवं मायिक अवलोकरूप हो रही जगत्‌ के विस्ताररूप से जगत्‌-सी होकर अवस्थित है