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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, Verses 34–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, verses 34–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 34-38

संस्कृत श्लोक

इदं जगदहंतादि नेह किंचिन्न विद्यते । जगच्छब्दार्थरहितं जगदस्ति शिवात्मकम् ॥ ३४ ॥ व्योम्न्येव निर्मितं शान्तं व्योम्ना सूक्ष्मतरेण च । यथा नभसि शून्यत्वं तथेदं जगदीश्वरे ॥ ३५ ॥ सदृशं स्वस्वरूपेण न वा रूपेण केनचित् । एवंरूपं जगदिदं सम्यग्ज्ञातं शिवं भवेत् ॥ ३६ ॥ सम्यग्ज्ञानप्रभावेण विषमप्यमृतायते । असम्यग्ज्ञातमशिवं जगद्दुःखप्रदं परम् ॥ ३७ ॥ विषबुद्ध्यामृतमपि भुक्तं विषरसायते । ईदृशश्च यथा वेत्ति यद्यदेष चिदीश्वरः ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

समुद्र पंचीकृत जल का कार्य है, अतः पंचीकृत जल के कारण भूतो के द्वारा तथा वायु आदि अन्य निमित्तों के द्वारा जलके परिणामभूत तरंग आदि सकारणक हैं, परन्तु ब्रह्म का तो कोई कारण प्रसिष्द है नहीं और न कोई उसका सहकारी कारण है, इसलिए ब्रह्मविवर्त जगत्‌ अकारणक कहा, यही वैषम्य मेरा अभिप्रेत है । इस तरह वैषम्य तत्त्वज्ञान के पूर्व कोई समझ नहीं सकता, परन्तु आपने तो तत्त्त अब जान लिया है, अत: आपके लिए वह सुबोध है, इस आशय से कुम्भ कहते हैं। कुम्भ ने कहा : हे राजन्‌, आपका कथन सत्य है, परन्तु आपने तो अब तत्त्वतः सब कुछ जान लिया है, इसलिए उस वैषम्य का परिज्ञान आपसे दूर नहीं रह सकता | यह अहन्ता आदि जगत्‌ इस ब्रह्म में कुछ अस्तित्व ही नहीं रखता ॥३ ३॥ सब द्वैत का बाध हो जाने के कारण यदि आप “जगत्‌ अकारणक है“ यों कहते हैं, तो ब्रह्म मे जगत्‌ है“ यह क्यो कहते हैं, ऐसा कहने में तात्पर्य क्या है“ इस पर कहते हैं। “जगत्‌' शब्द का प्रसिद्ध जो अर्थात्मकस्वरूप है, उससे निर्मुक्त परम शान्त कल्याणमय परमात्मा ही जगत्‌ है, उससे अतिरिक्त कुछ है नहीं। आकाश में सूक्ष्मतर आकाश ने ही उसका निर्माण किया है अर्थात्‌ जैसे आकाश में सूक्ष्मभूत मायारूप आकाश से गन्धर्वादि नगर निर्मित होते हैं, वैसे ही ब्रह्माकाश में भी सूक्ष्मभूत माया से जगत्‌ का निर्माण हुआ है, वास्तव में कुछ नहीं है। जैसे आकाश शून्यरूप नहीं है, परन्तु प्रतीयमान विरुद्ध शून्यत्व आकाश की सत्ता से सत्ता प्राप्त करता है, वैसे ही परमेश्वर में अविद्यमान जगत्‌ उसकी सत्ता से सत्ता प्राप्त करता है, वह चैतन्यैकरूप से सदृश ओर जड़रूप से विसदृश भी है। उस प्रकार का यह जगत्‌ भलीभाँति जान लिये जाने पर परम शिवरूप हो जाता है, क्योंकि उत्तमज्ञान के प्रभाव से विष भी अमृत हो जाता है। यदि जगत्‌ भलीभाँति न जाना गया तो वह भयंकर दु:ख देनेवाला होता है, ठीक ही है - विषबुद्धि यदि अमृत में हो जाय, तो वह खाया गया भी विष के रस में ही परिणत हो जाता है - खानेवाले को मार डालता हे । विद्या की सहायता से या अविद्या की सहायता से युक्त होकर जो कोई भी पुरुष जिस प्रकार से जिस-जिस वस्तु को चैतन्य परमात्मारूप जानता है, उस पुरुष को वह वह वस्तु तत्काल ही उक्तरूप ईश्वरात्मक बन जाती है