Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
अजृम्भमाणमेवेदं जगत्त्वेनेव संस्थितम् ।
यन्मया एव तेनैव मिथः संप्रेरिताशयम् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि पृथिवी आदि का वास्तव में अस्तित्व है नही, तो यः पृथिव्यां तिष्ठन्“ इत्यादि श्रुति से
प्रतिपादित जो यह सिद्धान्त है कि अन्तयमिी इश्वर द्वारा प्रेरित हुए ही सम्पूर्ण पदार्थ एक दूसरे के कार्य
में समर्थ होते हैं, उसकी उपपत्ति कैसे होगी 2
मायाशबल परमात्मा के स्वरूपभूत समस्त पदार्थ उसीसे (मायाशबल परमात्मा से) माया द्वारा
परस्पर मिलने के लिए सामग्रीरूप से प्रेरित होकर पंचभूतात्मक पिंड में मायिक ही तत्-तत् कार्यरूप
चमत्कार उस प्रकार करते रहते हैं, जिस प्रकार यौवन में स्त्री-पुरुष के जोड़े काम से प्रेरित होकर
पुत्रादि कार्यरूप चमत्कार करते रहते हैं