Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
तस्मान्न जायते किंचित्परस्माद्ब्रह्मणो मुने ।
कथं किं लभ्यते केन यथोर्म्यादि सकारणम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
इन सब बातों से अध्यासपक्ष मे किसीको भी जन्म आदि विकार की प्रसक्ति नहीं होती, केवल
कूटस्थत्व ही सिद्ध होता है, यह कहते है ।
हे मुने, इससे यह सिद्ध हुआ कि परब्रह्म से किसीकी भी उत्पत्ति नहीं होती, क्या कोई भी पुरुष
किसी तरह से क्या सकारण तरंग आदि को जलादि से पृथक् प्राप्त कर सकता है ? अर्थात् नहीं कर
सकता, बस इसी तरह देशकाल के परिच्छेद से शून्य ब्रह्म मे अकारण जगत भी ब्रह्म से पृथक् नहीं रह
सकता निष्कर्ष यह है कि लोक में यह प्रसिद्ध है कि तरंग के प्रति जल कारण है, परन्तु विमर्शकाल में
सकारण तरंग जल से भिन्न नहीं ठहरता, इसी प्रकार परिच्छेदशून्य ब्रह्म में विचारकाल मे जगत्कारणता
ठहर नहीं सकती