Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 74
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- Verses 1–2दुःसाध्य अर्थ भी जिस रीति से सिद्ध हुआ वह मुझसे कहिए । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी…
- Verses 3–24उसकी दान में प्रसिद्धि बतलाते हैं। चन्द्रमा की नाई प्रसन्न मुखवाले, चिन्तामणि के सदृश अभी…
- Verse 25यों गुरु द्वारा उपदेश ग्रहण कर चुके राजा भगीरथ विवेक से अपने-आप आत्मतत्व का हृदय में पयाल…
- Verse 26अभान का उपपादक जो अज्ञानांश तथा अन्य का अवभासक जो विक्षेपांश है वह नष्ट नहीं हुआ है, यह द…
- Verse 27राज्यादि मेँ अभिमान होने से तत्-तत् विषयों में चित्त के बराबर दौडते रहने के कारण भगीरथ…
- Verse 28अमानित्व आदि में से कुछ साधनों को पृथकृकर उनका अनुवाद ओर व्याख्यान करते हैँ । विषयों मे आ…
- Verses 29–31“मयि वाऽनन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी” इसका तात्पयार्थ दिखलाते है । अनन्ययोग से यानी अभेदभा…
- Verses 32–35तव अहंकार-परित्याग का उपाय ही पहले मुझसे कहिये, इस अभिप्राय से राजा भगीरथ पूछते हैं। भगीर…
- Verse 36सर्वत्याग ही अवश्य कर्तव्य है, इसलिए उसीका विस्तारपूर्वक प्रतिपादन करते हैं। हे राजन्, य…