Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 74, Verses 3–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 74, verses 3–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 3-24
संस्कृत श्लोक
संकल्पानन्तरं प्राप्ता यथाभिमतमर्थिनः ।
चन्द्रप्रसन्नवदनादस्माच्चिन्तामणेरिव ॥ ३ ॥
साधूनां यो व्यवस्थार्थं धनान्यविरतं ददौ ।
तृणमात्रमुपादत्ते क्वचिच्चिन्तामणिर्यथा ॥ ४ ॥
वज्रसारमिव प्रोतमुज्वलन्नेमि योऽभिनत् ।
अधो मणिरयोयन्त्रं सर्वदुर्जनचेष्टितम् ॥ ५ ॥
अधूमवह्निदेहश्रीः श्रान्तोऽपि दैन्यमप्यलम् ।
तमोऽहरन्नृणां नैशं द्युमणिर्वेश्मनामिव ॥ ६ ॥
किरन्नग्निकणासारमभितः स्वप्रतापजम् ।
मध्याह्नसूर्यकान्ताग्निरिव ज्वलति योऽरिषु ॥ ७ ॥
मृदुशीतलसंस्पर्शो यः समाह्लादयन्मनः ।
सुज्ञानां द्रवति स्निग्धस्येन्दोरिन्दुमणिर्यथा ॥ ८ ॥
जगद्यज्ञोपवीतस्य स्वर्गपातालवाहिनः ।
गङ्गावाहस्य येनास्यां तृतीयः पूरितो गुणः ॥ ९ ॥
अगस्त्यशोषितोऽम्भोधिर्गङ्गापूरेण पूरितः ।
येन दुष्पूरभूतोऽपि महासार्थोऽर्थिनामिव ॥ १० ॥
गङ्गासोपानपद्धत्या येन पातालवासिनः ।
योजिता ब्रह्मणो लोके बान्धवा लोकबन्धुना ॥ ११ ॥
ब्रह्माणं शंकरं जह्नुं तपसाराधयंश्च यः ।
भूयोभूयो ययौ खेदमशून्याध्यवसायिनः ॥ १२ ॥
यौवने वर्तमानस्य तस्य भूमिपतेरपि ।
प्रविचारयतो लोकयात्रां पर्याकुलामिमाम् ॥ १३ ॥
सुविरागचमत्कारविचारकणिकोदभूत् ।
वयस्यपि च तारुण्ये दैवाद्वल्ली मराविव ॥ १४ ॥
एकान्ते चिन्तयामास महीपतिरसाविति ।
जगद्यात्रामिमां नित्यमसमञ्जसमाकुलम् ॥ १५ ॥
पुनर्दिनं पुनः श्यामा दानादानशतं पुनः ।
तदेव भुक्तविरसं लक्ष्यते कर्म कुर्वताम् ॥ १६ ॥
येन प्राप्तेन लोकेऽस्मिन्न प्राप्यमवशिष्यते ।
तत्कृतं सुकृतं मन्ये शेषं कर्म विषूचिका ॥ १७ ॥
पुनःपुनः पर्युषितं कर्म कुर्वन्न लज्जते ।
मूढ्बुद्धिरबुद्धिस्तु कः कुर्यात्किल बालवत् ॥ १८ ॥
अथैकदोद्विग्नमनाः कदाचित्त्रितलं गुरुम् ।
एकान्तं संसृतेर्भीतः समपृच्छद्भगीरथः ॥ १९ ॥
भगीरथ उवाच ।
अन्तःशून्यासु सुचिरं भ्रमत्संसारवृत्तिषु ।
अरण्यानीषु चैतासु भृशं खिन्ना वयं विभो ॥ २० ॥
जरामरणमोहादिरूपाणां भवकारिणाम् ।
भगवन्सर्वदुःखानां कथमन्तः प्रजायते ॥ २१ ॥
त्रितल उवाच ।
चिरसाम्यात्मनोत्थेन निर्विभागविलासिना ।
राजन् ज्ञेयावबोधेन पूर्णेन भरितात्मना ॥ २२ ॥
क्षीयन्ते सर्वदुःखानि त्रुट्यन्ति ग्रन्थयोऽभितः ।
संशयाः समतां यान्ति सर्वकर्माणि चानघ ॥ २३ ॥
ज्ञेयं विदुरथात्मानं संशुद्धं ज्ञप्तिरूपिणम् ।
स च सर्वगतो नित्यं नास्तमेति न चोदयम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
उसकी दान में प्रसिद्धि बतलाते हैं।
चन्द्रमा की नाई प्रसन्न मुखवाले, चिन्तामणि के सदृश अभीष्ट अर्थो को देनेवाले इस राजा से
याचक गण अपने संकल्प के उत्तरकाल मेँ समीपगमन, शब्दोच्चारण आदि परिश्रम के बिना अभीष्ट
अर्थ प्राप्त कर लेते थे । वह साधुओं की रक्षा के लिए निरन्तर धन देता था, आयस्थानों में से अपने धर्म
के अनुसार प्राप्त हुए तृण को भी लेता था। वह अर्थियं के लिए तो कामधेनु सदश था । वज्र के सदृश
कठिन पदार्थो को छेदन करनेवाली ऊपर की मणि लोहे से बंधी दूसरी नीचे की मणि को - अपनी
कान्ति से यन्त्रचक्रनेमि को चमकाती हुई - छेदकर तागे में गुँथने के योग्य जैसे बना देती है, वैसे ही
राजा भगीरथ ने अत्यन्त बलशाली भी सब दुर्जनो के देशों पर आक्रमण द्वारा उनके मण्डलो को अपने
प्रताप से उज्ज्वल एवं रथनेमि से चिन्हित बनाते हुए उनके शस्त्रास्त्रं को छीन करके उनके पैरों मे बेड़ी
पहनाकर उनकी काली करतूतों को एक तरह से नष्ट करके उन्हे गुणयुक्त बनाया था । धूम्ररहित अग्नि
के समान शरीर की कान्ति से युक्त वह राजा प्रजाओं की रक्षा के लिए रात-दिन चारों ओर खूब घूमने-
फिरने से स्वयं थका हुआ भी मनुष्यों के अधर्म में प्रवृत्ति की हेतुभूत घर की अन्धकारस्वरूप दरिद्रता
का पूर्णरूप से उस तरह अपहरण करता था, जिस तरह रात की अन्धकाररूपी दरिद्रता का सूर्य । अपने
प्रताप से जनित अग्निकिरणों की चारों ओर घनघोर वृष्टि करता हुआ वह शत्रुओं के ऊपर उस तरह
प्रज्वलित रहता था, जिस तरह मध्याहकाल में सूर्यकान्तमणि से उत्पन्न अग्नि तृणादि के ऊपर
प्रज्वलित रहती है । मृदु ओर शीतल स्पर्शवाला वह ब्रह्मतत््वज्ञानियों की सन्निधि में उनके चित्त को
आह्नादित करता हुआ उस प्रकार पिघल जाता था, जिस प्रकार स्निग्ध चन्द्रमा की सन्निधि मेँ
चन्द्रकान्तमणि । उसने स्वर्ग और पाताल में बहनेवाले गंगा के प्रवाहरूपी जगत् के यज्ञोपवीत का
तीसरा तन्तु इस पृथिवी पर गंगा के अवतरण से पूरा किया । उसने अगस्त्यमुनि से शोषित सागर को
गंगा के प्रवाह से उस तरह पूरा किया, जिस तरह सब दिशाओं में एक छोर से दूसरे छोर तक भटक रहे
दुष्पूरभूत याचको के समूह को धन से पूरा किया। संसार के प्राणियों के द्रोही तथा ब्रह्मशाप से भस्मीभूत
होने के कारण अधोगति को प्राप्त हुए अपने भाइयों को उस लोकबन्धु ने गंगारूपी सोपानपद्धति से
अर्थात् गंगारूपी सीढी लगाकर ब्रह्मलोक में पहुँचाया अपनी तपस्या से ब्रह्मा, शंकर ओर जहनु को
प्रसन्न रखता हुआ वह अविच्छिन्न दृढ़ निश्चय से युक्त अपने मन से बार-बार क्लेश को प्राप्त हुआ।
हे श्रीरामजी, युवावस्था में वर्तमान आप ही के समान भयंकर इस लोकयात्रा का खूब विचार कर
रहे उस राजा को युवावस्था में ही, अचानक मरुस्थल में लता की नाई उत्तम वैराग्यरूपी चमत्कार से
परिपूर्ण विचार की कणिका उत्पन्न हुई । वह राजा एकान्त में असमंजस में पडकर व्याकुल होकर के
इस संसारयात्रा का प्रतिदिन यों विचार करने लगा। फिर दिन ओर फिर वही रात, फिर वही सैकड़ों दान
देना और लेना तथा सभी प्राणियों का वही भुक्त ओर नीरस कर्म दिखाई पड़ता है जिसे वे पुनः पुनः
करते हैं, कोई अपूर्वं कर्म तो दिखाई पडता नहीं, जिसका फल परम पुरुषार्थ हो । इस संसार में जिसके
प्राप्त हो जाने से दूसरा कोई प्राप्य पदार्थ अवशिष्ट नहीं रहता, मैं उसी कृत को सुकृत समझता हूँ।
अवशेष कर्म तो विसूचिका है यानी तत्-तत् फलप्राप्ति के साधनभूत किये गये कर्मो का फल विसूचिका
की नाई अशुद्धि से ग्रस्त दुःख ही है। पुनः पुनः पर्युषित अनविन कर्म कर रहा मूढबुद्धि प्राणी लज्जित
नहीं होता। बुद्धिशून्य कोई प्राणी तो अवश्य ही बालक की तरह बार-बार एक ही कर्म करता रहेगा | इस
तरह चिन्ता करने के अनन्तर संसार से अत्यन्त डरे हुए उद्विग्न मन होकर किसी एक दिन राजा भगीरथ
ने अपने गुरु त्रितल से पूछा | भगीरथ ने कहा : विभो, खूब भ्रमण कर रहे जीवों के सारहीन राग, द्वेष
आदि से युक्त सांसारिक व्यवहारो में तथा उन व्यवहारो के फलभूत इन स्वर्ग-नरक~-मनुष्यादि-
स्वरूप बड़े-बड़े जंगलों मे भटक रहे हम सब अत्यन्त खिन्न हो गये हैँ । भगवन्, संसार में फँसानेवाले
जरा-मरण-मोहादिरूप सब दुःखों का अन्त कैसे होता है ? त्रितल ने कहा : हे पापशून्य राजन्,
साधनचतुष्टयसम्पन्न श्रवण, मनन आदि उपायों के द्वारा चिरकाल से अभ्यस्त हुई विक्षेप ओर विभिन्नता
से शून्य समाधि से तथा अनादिसिद्ध ब्रह्माकारवृत्ति से आविरभूत विशेषरहित स्फुरित हो रहे, अखण्ड
ओर व्याप्त प्रत्यकृतत्त के अवबोध से सब दुःख नष्ट हो जाते हैं, चारों ओर से ग्रन्थियाँ टूट जाती हैं,
सब संशय तथा सब कर्म समता को प्राप्त हो जाते हैं इसके बाद सुनो, हे राजन्, तत्त्वज्ञानियों ने शुद्ध
ज्ञानस्वरूप आत्मा को ही ज्ञेय बतलाया है ओर वह आत्मा सर्वव्यापी तथा नित्य है । न तो वह अस्त
होता है ओर न उदय को ही प्राप्त होता हे