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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 74, Verses 29–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 74, verses 29–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 29-31

संस्कृत श्लोक

आत्मनोऽनन्ययोगेन तद्भावनमनारतम् । विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ २९ ॥ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं तदतोऽन्यथा ॥ ३० ॥ रागद्वेषक्षयाकारं संसारव्याधिभेषजम् । अहंभावोपशान्तौ तु राजन् ज्ञानमवाप्यते ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

“मयि वाऽनन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी” इसका तात्पयार्थ दिखलाते है । अनन्ययोग से यानी अभेदभाव से (आत्मा ही ब्रह्म है आत्मातिरिक्त दूसरा कोई पदार्थ हे ही नहीं, इस प्रकार की अभेदभावना से) अविच्छिन्न आत्मा में निरन्तर ब्रह्मभावना, पवित्र निर्जनदेश का सेवन, पामर अज्ञानियों की सभा में अनास्था, आत्मज्ञान के साधन वेदान्तशारत्र में तत्परता, तत्त्वज्ञान का फलभूत जो मोक्षरूप अर्थ है उसकी सिद्धि के लिए प्रक्रिया का निरन्तर अनुसाधन, ये सब तत्त्वज्ञान के साधन होने से ज्ञानरूप कहे गये हें । इनसे भिन्न अन्यान्य विषयज्ञानसाधन आत्मज्ञान के उत्पादक न होने के कारण अज्ञान कहे गये हैं । हे राजन्‌, अहंभाव की शान्ति हो जाने पर ही रागद्वेष का विनाश कर देनेवाला तथा संसाररूपी व्याधि की ओषधि आत्मतत्त्वज्ञान प्राप्त होता हे । आत्मज्ञान के जितने साधन हैं, उन सबकी प्राप्ति में मूल तो अनहंभाव ही है । यदि अहंभाव बना रहा तो कोई भी पुरुष अमानित्व आदि साधनों की प्राप्ति नहीं कर सकता