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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 74, Verses 32–35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 74, verses 32–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 32-35

संस्कृत श्लोक

भगीरथ उवाच । शरीरेऽस्मिंश्चिरारूढो गिरौ तरुरिव स्वके । अहंभावो महाभाग वद मे त्यज्यते कथम् ॥ ३२ ॥ त्रितल उवाच । पौरुषेण प्रयत्नेन त्यक्त्वा भोगौघभावनाम् । गत्वा विकसितां सत्तामहंकारो विलीयते ॥ ३३ ॥ यन्त्रणापञ्जरं यावद्भग्नं लज्जादिनाखिलम् । अकिंचनत्वशेषेण स्फुटा तावदहंकृतिः ॥ ३४ ॥ सर्वमेतद्धिया त्यक्त्वा यदि तिष्ठसि निश्चलः । तदहंकारविलये त्वमेव परमं पदम् ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

तव अहंकार-परित्याग का उपाय ही पहले मुझसे कहिये, इस अभिप्राय से राजा भगीरथ पूछते हैं। भगीरथ ने कहा : हे महाभाग, पर्वत में दीर्घकाल से सुदृढ हुए वृक्ष की नाई अपने शरीर में दीर्घ काल से सुदृढ़ हुआ अहंभाव मैं किस उपाय से छोड सकता हू । त्रितल ने कहा : हे राजन्‌, ज्ञानाभ्यासरूपी पौरुष प्रयत्न से नानाविध तुच्छ लोकिक विषयों की भावना का पहले परित्याग कर, फिर विषयाभिलाषा का अभाव होने से परिस्फुट हुई शुद्ध आत्माकारता की प्राप्तिकर व्यवस्थित हुए पुरुष मेँ अहंभाव विलीन हो जाता ह । हे महाराज, "राज्य का परित्याग कर देनेसे जनता मेरा आदर नहीं करेगी, शत्रु लोग हँसेंगे, सबकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाला में लोगों से कैसे भिक्षा माँगूँगा, खराब अन्न, पान आदि से कैसे जीऊँगा” इत्यादि चिन्ता से जनित लज्जा, अभिमान आदि से बना हुआ घर मेँ पूर्ववत्‌ नियन्त्रणारूपी पिंजडा जब तक सर्वत्याग से पूरी तरह टूट -फूट नही जाता, तब तक यह अहंकृतिरूपी नर्तकी अत्यन्त विकसित होकर नाचती रहती हे । हे राजन्‌, यदि विचारबुद्धि से उन सबका परित्याग कर तुम निश्चल होकर स्थित रहोगे, तो अहंकार का विलय हो जाने पर तुम्हीं स्वयं परमपदस्वरूप (ब्रह्मस्वरूप) बन जाओगे