Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 74, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 74, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
त्रितल उवाच ।
ज्ञानेन ज्ञेयनिष्ठत्वमेति चेतो हृदम्बरे ।
ततः सर्ववपुर्भूत्वा भूयो जीवो न जायते ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
राज्यादि मेँ अभिमान होने से तत्-तत् विषयों में चित्त के बराबर दौडते रहने के कारण भगीरथ को
विक्षेप होता है, इसलिए अभिमान आदि के प्रबल होने से ही उन्हे स्पष्ट आत्मज्ञान नहीं हो पाता, यह
निश्चय करके भगीरथ के गुरु त्रितलजी महाराज गीतोक्त अमानित्वादि साधनों का उपदेश देते है ।
त्रितल ने कहा : हृदयाकाश में यह चित्त अमानित्वादि ज्ञान से “ज्ञेयं यत्तत् प्रवक्ष्यामि" इत्यादि
भगवान् द्वारा दिखलाये गये ज्ञेय में स्थिरता प्राप्त करता हे यानी ज्ञेय में स्थिर हो जाता है । उसके
अनन्तर पूर्णस्वभाव होकर यह जीव फिर उत्पन्न नहीं होता अर्थात् पूर्णस्वभाव से च्युत नहीं होता