Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 74, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 74, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
किं तत्र प्रतिपत्तिर्मे स्फुटतामेति नेतरा ।
एतावन्मात्रसंवित्तिः स्यामहं भगवन्कथम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
अभान का उपपादक जो अज्ञानांश तथा अन्य का अवभासक जो विक्षेपांश है वह नष्ट नहीं हुआ
है, यह दिखलाते हैं।
किन्तु सत् ओर असत् के विवेकज्ञान के बीच में पहली सदात्मबोधरूपा जो मेरी प्रतिपत्ति है
(सत्स्वरूप आत्मा के बोध में जो मेरा ज्ञान हे) वह हस्तगत आमलक की तरह बिलकुल स्पष्टता को
प्राप्त नहीं हो रही है, (स्थिर प्रतिष्ठा को प्राप्त नहीं हो रही है) इसमें क्या कारण है ? भगवन्, मैं किस
उपाय से सम्पूर्ण विक्षेपो की शान्ति से युक्त केवल चिन्मात्रानुसन्धानमय होऊँ ? (कृपाकर उस उपाय
को बतलाइये)